गणितज्ञ आर्यभट्ट जहाँ होंगे अपनी इसरो की कामयाबी पर मुस्कुरा रहे होंगे।
गणितज्ञ आर्यभट्ट जहाँ होंगे अपनी इसरो की कामयाबी पर मुस्कुरा रहे होंगे। इसरो की कामयाबी से पुरी दुनिया में भारत का सिर ऊँचा हुआ।
इसरो की कामयाबी से पुरी दुनिया में भारत का सिर ऊँचा हुआ।
एक के बाद एक कामयाबी ने इसरो के हौसले तो बुलंद किए ही हैं, साथ ही दुनिया में भी भारत की पहचान बनाई है। इसरो ने देश के पहले सैटेलाइट आर्यभट्ट को बनाया था जिसकी लॉन्चिंग 19 अप्रैल 1975 को सोवियत यूनियन ने की थी। गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर ही इसे नाम दिया गया था। 1975 से लेकर आजतक की इसरो की कई उपलब्धियां रही हैं लेकिन हम उसकी कुछ खास कामयाबी के बारे में आपको बता रहे हैं-
एक साथ 104 सैटेलाइट की लॉन्चिंगः
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने बुधवार को एक नया कीर्तिमान बना दिया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 9.28 मिनट पर एकसाथ 104 सैटेलाइट को सफलता पूर्वक लॉन्च किया गया। इससे पहले एकसाथ इतने सैटेलाइट कभी नहीं छोड़े गए थे। यह रिकॉर्ड अभी तक रूस के पास था। उसने 2014 में एक साथ 37 सैटेलाइट भेजे थे।
चंद्रयानः
चंद्रयान चंद्रमा पर भेजा गया भारत का पहला अंतरिक्ष यान है। इस अभियान के अन्तर्गत एक मानवरहित यान को 22 अक्टूबर, 2008 को चन्द्रमा पर भेजा गया और यह 30 अगस्त, 2009 तक सक्रिय रहा। यह यान पोलर सैटेलाइट लॉन्च वीइकल (पी एस एल वी) के एक परिवर्तित संस्करण वाले राकेट की सहायता से सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से प्रक्षेपित किया गया। इससे पहले ऐसा सिर्फ छह देश ही कर पाए थे।
मंगलयानः
मंगलयान भारत का प्रथम मंगल अभियान था। इस परियोजना के अन्तर्गत 5 नवम्बर 2013 को 2 बजकर 38 मिनट पर मंगल ग्रह की परिक्रमा करने हेतु छोड़ा गया एक उपग्रह आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसऍलवी) सी-25 के द्वारा सफलतापूर्वक छोड़ा गया। इसके साथ ही भारत भी अब उन देशों में शामिल हो गया है जिन्होंने मंगल पर अपने यान भेजे हैं। वैसे अब तक मंगल को जानने के लिये शुरू किये गये दो तिहाई अभियान असफल भी रहे हैं परन्तु 24 सितंबर 2014 को मंगल पर पहुँचने के साथ ही भारत विश्व में अपने प्रथम प्रयास में ही सफल होने वाला पहला देश तथा सोवियत रूस, नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद दुनिया का चौथा देश बन गया है।
खुद का नेविगेशन सिस्टमः
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने 28 अप्रैल 2016 भारत का सातवां नेविगेशन उपग्रह IRNSS (इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम) लॉन्च किया। इसके साथ ही भारत को अमेरिका के जीपीएस सिस्टम के समान अपना खुद का नेविगेशन सिस्टम मिल गया। जीपीएस के लिए इससे पहले तक दुनिया में तीन बड़े देशों के सिस्टम ही व्यवसायिक तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं। इन सिस्टमों को उनके देश की सेना भी इस्तेमाल करती है। दुनिया में जो नेविगेशन सिस्टम सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है, उसे GPS कहते हैं। इसका नियंत्रण अमेरिकी सेना के पास है। रूस के नेविगेशन सिस्टम का नाम GLONASS है। वहीं, चीन भी अपने नेविगेशन सिस्टम BeiDou का विस्तार कर रहा है। इसे भी चीन की सेना ही नियंत्रित करती है। वहीं, यूरोप का GALILEO एक सिविल ग्लोबल सिस्टम है। इन सभी सिस्टम में 28 से 35 सेटेलाइट इस्तेमाल होते हैं।
जीएसएलवी मार्क 2 :
जीएसएलवी मार्क 2 की कामयाब लॉन्चिंग भारत के लिए बड़ी कामयाबी थी क्योंकि इसमें भारत ने अपने ही देश में बनाया हुआ क्रायोजेनिक इंजन लगाया गया था। इसके बाद भारत को सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना पड़ा।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने आज एक नया कीर्तिमान बना दिया। आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 9.28 मिनट पर एकसाथ 104 सैटेलाइट को सफलता पूर्वक लॉन्च किया गया। इससे पहले एकसाथ इतने सैटेलाइट कभी नहीं छोड़े गए थे। यह रिकॉर्ड अभी तक रूस के पास था। उसने 2014 में एक साथ 37 सैटेलाइट भेजे थे।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने आज सुबह एक साथ 104 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजकर इतिहास रच दिया। उपग्रहों का प्रक्षेपण भारतीय रॉकेट ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पीएसएलवी) के जरिए किया गया। जिन उपग्रहों को प्रक्षेपित किया गया है, उनमें देश का पृथ्वी अवलोकन उपग्रह काटरेसैट-2 सीरीज भी शामिल है। 44.4 मीटर लंबे और 320 टन वजनी रॉकेट पीएसएलवी-एक्सएल ने सुबह 9.28 बजे आकाश को चीरते हुए उड़ान भरी
308 Retw
480 likपृथ्वी अवलोकन उपग्रह काटरेसैट-2 सीरीज का वजन 714 किलोग्राम है। अन्य उपग्रहों में 101 नैनो उपग्रह हैं, जिनमें से इजरायल, कजाकस्तान, द नीदरलैंड्स, स्विट्जरलैंड व संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के एक-एक और अमेरिका के 96 और भारत के दो नैनो उपग्रह शामिल हैं। इन सभी उपग्रहों का कुल वजन लगभग 1,378 किलोग्राम है।इसरो के एक अधिकारी ने नाम न जाहिर करते हुए कहा किकाटरेसैट उपग्रह पृथ्वी अवलोकन उपग्रह के काटरेसैट-2 सीरीज में चौथा उपग्रह है। इस सीरीज के तीन उपग्रह पहले ही पृथ्वी की कक्षा में हैं और दो अन्य का प्रक्षेपण किया जाना है। काटरेसैट-2 सीरीज के सभी छह उपग्रहों को प्रक्षेपित किए जाने के बाद काटरेसैट-3 सीरीज लॉन्च किया जाएगइस ऐतिहासिक प्रक्षेपण से भारत को होने वाले फायदों पर एक नज़र…
इसरो के चेयरमैन एएस किरण कुमार ने मीडिया से कहा कि हम जिन सैटेलाइट को लाँच कर रहे हैं, उसमें एक 730 किग्रा का है, जब बाक़ी के दो का वजन 19-19 किग्रा है। इनके अलावा हमारे पास 600 किग्रा और वजन भेजने की क्षमता थी, इसलिए हमने 101 दूसरे सैटेलाइटों को भी लाँच करने का फ़ैसला लिया।
किरण कुमार ने इस पूरे अभियान पर होने वाले खर्च का ब्यौरा तो नहीं बताया लेकिन ये स्पष्ट किया कि मिशन का आधा खर्च विदेशी सैटेलाइटों को भेजने से आ रहा है। हालांकि अनुमान है कि इसरो को विदेशी सैटेलाइटों से 100 करोड़ रूपये से ज़्यादा की आमदनी होगी।
जिन देशों के सैटेलाइट्स को इसरो लाँच करने जा रहा है, उसमें अमरीका और इसराइली सैटेलाइट भी शामिल हैं। ये साफ इशारा है कि सैटेलाइट प्रक्षेपण के बाज़ार में भारत बड़ी तेजी से अपनी जगह बना रहा है।
पिछले कुछ सालों में भारत अंतरिक्ष प्रक्षेपण के बाज़ार में भरोसेमंद प्लेयर बनकर उभरा है। बीते कुछ सालों में भारत ने दुनिया के 21 देशों के 79 सैटेलाइट को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया है, जिसमें गूगल और एयरबस जैसी बड़ी कंपनियों के सैटेलाइट शामिल रहे हैं।
भारत के दो नैनों सैटेलाइट में आईएनएस-1A और आईएनएस-1बी है। इन दोनों का वजन 19-19 किग्रा है। इसके अलावा पीएसएलवी पहली बार भारत का 714 किग्रा का कार्टोसैट-2 सीरीज का सैटेलाइट भी लॉन्च कर रहा है। ये पृथ्वी के ऑब्जर्वेशन की दिशा में भारत का बड़ा क़दम है।
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