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Rajendra babu ko naman

साभार क्रांतिस्वर
संयोजन राम बालक रॉय


डॉ राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 03 दिसंबर 1884 को और  मृत्यु 28 फरवरी 1963 मे हुई थी । वह स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे और स्वाधीनता आंदोलन मे उनकी अग्रणी भूमिका रही थी। उनकी मृत्यु के 48 वर्ष बाद भी उनके विचारों की प्रासंगिकता आज भी है और आज का राजनीतिक संकट उन विचारों से हट जाने के कारण ही उत्पन्न हुआ है। राजेन्द्र बाबू का व्यक्तित्व कैसे प्रभावशाली बन सका इसका विवेचन गत वर्ष किया था। 

राजेन्द्र बाबू का जन्म एक जमींदार परिवार मे हुआ था और उन्हें सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त थीं। वह काफी प्रतिभाशाली थे। वकालत पास करने के बाद यदि प्रेक्टिस करते तो और धनशाली ही बनते। किन्तु उस समय के बड़े कांग्रेसी नेता गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें बुला कर उनसे कहा कि तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं है और वकालत करके खूब पैसा कमा लोगो लेकिन मै चाहता हूँ कि तुम देश-सेवा मे लगो  तो तुम्हारी प्रतिभा का लाभ देशवासियों को भी मिल सके। राजेन्द्र बाबू ने गोखले जी की सलाह को आदेश मान कर शिरोधार्य कर लिया और आजीवन उसका निर्वहन किया। जन्म से प्राप्त सुख-सुविधाओं का परित्याग करके सादगी ग्रहण करके राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन मे कूद पड़ना राजेन्द्र बाबू को असहज नहीं लगा।

गांधी जी और नेताजी सुभाष के मध्य मतभेद होने की दशा मे सुभाष बाबू ही 'नीलकंठ' बन कर सामने आए और कांग्रेस की अध्यक्षता सम्हाली। निराश-हताश कांग्रेसियों मे नव-जीवन का संचार करके राजेन्द्र बाबू ने अपने कुशल नेतृत्व से स्वाधीनता आंदोलन को नई दिशा दी। स्वातंत्र्य -समर के योद्धा के रूप मे राजेन्द्र बाबू को कई बार जेल-यात्राएं भी करनी पड़ी। जेल मे भी चिंतन-मनन उनकी दिनचर्या रहते थे। यहाँ तक कि जब एक बार जेल मे उनको कागजों का आभाव हो गया तो उन्होने कागज के नोटों पर भी अपने विचार लिख कर रख लिए थे। 'खंडित भारत' की रचना भी उन्होने जेल-प्रवास के दौरान ही की थी। इस पुस्तक से राजेन्द्र बाबू की दूर-दर्शिता का आभास होता है जो उन्होने आजादी से काफी पहले विभाजन से होने वाले दुष्परिणामों की कल्पना कर ली थी। लेकिन अफसोस कि उनकी सीख को नजर-अंदाज कर दिया गया और नतीजा भारत,पाकिस्तान तथा बांग्ला देश की जनता आज तक भोग रही है।

राष्ट्रपति बनने पर उन्होने 'राष्ट्रपति भवन' से रेशमी पर्दे आदि हटवा कर खादी का सामान -चादर,पर्दे आदि लगवाए थे जो उनकी सादगी-प्रियता का प्रतीक है। वह विधेयकों पर आँख बंद करके हस्ताक्षर नहीं करते थे बल्कि अपने कानूनी ज्ञान का उपयोग करते हुये खामियों को इंगित करके विधेयक को वांछित संशोधनों हेतु वापस कर देते थे और सुधार हो जाने के बाद ही उसे पास करते थे। उनके लिए जनता का हित सर्वोप्परि था। स्व . फख़रुद्दीन अली अहमद  द्वारा विदेश मे एमेर्जेंसी पर और श्री ए पी जे कलाम साहब द्वारा बिहार की राजद सरकार हटा कर राष्ट्रपति शासन लगाने के आदेश विदेश से देना राष्ट्रपति पद का अवमूल्यन करना है और  जो राजेन्द्र बाबू की नीतियों के उलट है। उनके उत्तराधजीकारी डॉ राधा कृष्णन भी कांग्रेस अध्यक्ष कामराज नाडार के षड्यंत्र मे फंस कर एक बार तो संविधान विरोधी कार्य मे तत्पर हो गए थे जो नेहरू जी की सतर्कता से विफल हो गया था। किन्तु डॉ राजेन्द्र प्रसाद जी ने नेहरू जी से तमाम मतभेदों के बावजूद कभी भी संविधान विरोधी कदम उठाने की बात नहीं सोची जबकि उन्हें तो जनता और सत्तारूढ़ पार्टी मे आदर -सम्मान भी प्राप्त था और समर्थन भी मिल सकता था।

आम धारणा है कि संविधान निर्मात्री समिति के चेयरमेन डॉ भीम राव अंबेडकर ही संविधान निर्माता हैं परंतु संविधान सभा के सभापति की हैसियत से राजेन्द्र बाबू का संविधान निर्माण मे अमिट योगदान है। उनकी कुशल अध्यक्षता मे ही संविधान की धाराओं पर सम्यक विचार-विमर्श और बहसें सम्पन्न हुई। 26 जनवरी 1950 से लागू संविधान डॉ राजेन्द्र प्रसाद के हस्ताक्षरों से ही पारित हुआ है। अतः उनके योगदान को नकारा नहीं जाना चाहिए ।

संसद और विधान सभाओं मे आए दिन जो गतिरोध देखने को मिलते हैं वे राजेन्द्र बाबू की विचार-धारा के परित्याग का ही परिणाम हैं। आज देश-हित का तकाजा है कि फिर से राजेन्द्र बाबू की नीतियों को अपनाया जाए और देश को अनेकों संकट से बचाया जाये।

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